३. दुनियां छोड़ जाती है ...*
*दुनियां छोड़ जाती है ...*
✍🏽 *बिपिन कुमार चौधरी*
"क्या लिख रहे हो ?"
"वही जो पढ़ने लिखने वाले लोगों को पसंद नहीं है।"
"तो फिर किसके लिए लिख रहे हो ?"
"उनके लिए, जिन्हें पढ़ने लिखने की फुरसत नहीं है।"
"तब लिख कर फायदा क्या होगा ?"
"इन लोगों को आईना दिखाने के लिए.."
लड़की बीच में रोकते हुए "कुछ समझी नहीं ??"
"अगर पचास हजार की तनख्वाह उठाने वाला आदमी पांच हजार के लिए मजदूरी करने वाले से रिश्वत मांगे तो समझने के लिए बचता क्या है ?"
"तो वह कंप्लेन क्यों नहीं करता है ?"
"किसके पास करे ?"
"सीनियर अधिकारी के पास, पुलिस स्टेशन में, कोर्ट में...। क्या देश में कानून खत्म हो गया है ?
"कभी पुलिस स्टेशन गई हो ?"
"हां, कई बार ?"
"मान लो तुम्हारे साथ रेप हो जाए।"
"ए मिस्टर!! जुबान संभालो!!"
"तुम्हें गुस्सा भी आता है ?"
"क्या तुम्हें शर्म नहीं आती है ?"
" मुझे क्यों शर्म आए ?"
"ऐसी बेहूदी बातें करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हो गई ?"
"क्या इस देश में रेप नहीं होता ?"
"होता होगा ?"
"अगर तुम्हारे साथ हो तो क्या करोगी ?"
"लड़की गुस्से में आग बबुला होकर झापड़ रसीद करने के लिए हाथ उठाती है।"
"लड़का हाथ पकड़ कर जोर से हंसता है। अब जरा सोचो उस महिला पर क्या बितती होगी, जिसके साथ कुछ भेड़िए ऐसा कर गुजरते हैं।"
"मेरे बारे में ऐसा सोचने वाले को भी मैं कुत्ते की मौत मारूंगा।"
"क्या यह इतना आसान है ?"
"मैं समझी नहीं।"
"हादसे की कल्पना से तुमने आपा खो दिया लेकिन जिसके साथ हादसा होता है, उसकी मानसिक हालत की कल्पना करो।"
"बात में दम है।"
"क्या तुम्हें लगता है कि कोई पीड़ित लड़की या महिला किसी के विरुद्ध आवाज उठाने की स्थिति में होता है ?
"बहुत मुश्किल है ।"
"उन्हीं के लिए लिख रहा हूं।"
"ऐसे में पीड़ित लोगों तक सरकार और सरकारी सिस्टम को खुद पहुंच कर जनता की सुध लेनी चाहिए।"
"बहुत मुश्किल है।"
"आखिर क्यों ?"
"अच्छा यह बताओ, तुम जिस सिस्टम की बात कर रही हो, उसका हिस्सा बनने के लिए लोग क्यों बैचेन हैं ?"
"क्यों ?"
"क्योंकि सिस्टम का अंग बनकर इंसान वह सबकुछ कर सकता है जो आम इंसान नहीं कर सकता है।"
"मतलब!!"
"जनता की सोच गलत है।"
"कैसे ?"
"हमें थाना, ब्लॉक, अस्पताल, स्कूल और हर सरकारी कार्यालय में ईमानदार अफसर और बाबू चाहिए।"
"तो इसमें गलत क्या है ?"
"लेकिन अगर घर का बेटा, भाई या पिता ईमानदारी से अपनी ड्यूटी करे तो उस आदमी को घर के लोग ही बेवकूफ समझने लगते हैं।"
"बात तो सही बोल रहे हो।"
"और ओरिजनल बात तो यह है कि तुम जैसी खूबसूरत लड़की की शादी भी ढेर सारा दहेज देकर किसी सरकारी नौकरी वाले से इसलिए किया जाता है क्योंकि सरकारी नौकरी में बरकत बहुत है।"
लड़की मुस्कुराने लगती है।
"फिर बताओ इंसान ईमानदार कैसे बने और अगर बनने की कोशिश करे तो यह सिस्टम उसे आसानी से जीने नहीं देता है।"
"बदलाव कैसे होगा ?"
"बदलाव यहां चाहता कौन है ?"
" जो लोग मजबूर हैं ?"
"तुम्हें क्या लगता है कि इस देश में मजबूर लोगों को पावर नहीं मिला है।"
"बड़ी मुश्किल से मिलता है।"
"यही लोग बड़ी मुश्किल से पावर हासिल कर दूसरों के लिए मुश्किलें खड़ी करने लगते हैं।"
"मतलब"
"मतलब साफ है। आम आदमी कल भी लाचार था और आज भी है और भविष्य में भी रहेगा।"
"आखिर यह कब तक चलेगा ?"
"जब तक इस देश के प्रत्येक परिवार का एक एक आदमी अपनी अपनी जरूरतों को इतना सीमित नहीं कर ले कि परिवार के मुखिया को गलत तरीके से कमाने की जरूरत नहीं पड़े।"
"बहुत मुश्किल है।"
"मैं भी जानता हूं।"
"क्या ?"
"आम आदमी के साथ अत्याचार रुकना।"
"तो फिर लिख क्यों रहे हो।"
"इसलिए कि तुम जैसा कोई पढ़कर सवाल पूछ सके। आम इंसान के उस दर्द को महसूस कर सके जो सिस्टम का हर पावरफुल आदमी महसूस नहीं करना चाहता है।"
"कब तक ऐसे लिखते रहोगे।"
"जब तक मेरी जरूरतें मुझे घुटने टेकने को मजबूर नहीं कर दे।"
"चलती हूं।"
लड़का ठहाका लगाकर हंसता है।
"हर मजबूर आदमी को दुनियां अक्सर उसके हाल पर छोड़ कर यूं ही चली जाती है।"
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